श्रील प्रभुपाद ने अपना पूरा जीवन कृष्णभावनामृत के प्रचार की तैयारी में समर्पित किया। 1965 के बाद उन्होंने ISKCON की स्थापना कर अपने ग्रंथों, शिक्षाओं और शिष्यों के माध्यम से पूरे विश्व में कृष्णभक्ति का संदेश फैलाया।
Gift This Book
Send it to a devotee or sponsor a copy for ISKCON distribution
Share your name and phone so we can help you better. Then we'll open WhatsApp for you.
Please enter your name.
Please enter your phone number.
Please enter a valid email address.
Please enter your address.
Required.
Required.
📖 Enquiring about: Prabhupada - Messenger Of The Supreme Lord (Hindi)
🔒
Secure Payment
📦
Easy Returns
✅
100% Authentic
🚚
Pan India Delivery
About This Book
उनकी दिव्य कृपा ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी, जिन्हें बाद में श्रील प्रभुपाद के नाम से जाना गया, की विश्वव्यापी प्रसिद्धि 1965 के बाद—जब वे अमेरिका पहुँचे—होने वाली थी। भारत छोड़ने से पहले उन्होंने तीन पुस्तकें लिखी थीं; अगले बारह वर्षों में वे साठ से अधिक पुस्तकें लिखने वाले थे। भारत छोड़ने से पहले उन्होंने एक शिष्य को दीक्षा दी थी; अगले बारह वर्षों में वे चार हजार से अधिक शिष्यों को दीक्षा देने वाले थे। भारत छोड़ने से पहले शायद ही किसी ने विश्वास किया था कि वे कृष्ण-भक्तों के एक विश्वव्यापी समाज की अपनी दृष्टि को पूरा कर पाएँगे; लेकिन अगले दशक में उन्होंने इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शसनेस की स्थापना की और उसे बनाए रखा तथा सौ से अधिक केंद्र खोले। अमेरिका के लिए प्रस्थान करने से पहले वे कभी भारत से बाहर नहीं गए थे; लेकिन अगले बारह वर्षों में वे कृष्णभावनामृत आंदोलन का प्रचार-प्रसार करते हुए कई बार पूरी दुनिया की यात्रा करने वाले थे।
यद्यपि उनके जीवन का योगदान आध्यात्मिक उपलब्धियों के एक देर से आए क्रांतिकारी विस्फोट के रूप में दिखाई दे सकता है, लेकिन उनके जीवन के पहले उनहत्तर वर्ष उन उपलब्धियों की तैयारी थे।